नींद
यह नींद भी हमें क्यों आती है
आती है तो पुराणी यादें लाती है
सपने जो संजोये हमने,
कभी उन्हें झकझोर जाती है
दर्द जो छुपे हैं सीने में ,
कभी उन्हें कुरेद जाती है
अश्क़ जो सहेज रखे हैं हमने,
उसे यह बिखेर जाती है
ग़मों के इस अथाह सिंधु को
मेरे दामन में उढेल जाती है
अधूरी है जिंदगी मेरी,
इसका मुझे एह्साह दिलाती है
फिर भी इस थके मुसाफिर को
सहारे की कमी सताती है
अब तो आराम का इंतज़ार है
आ ऐ नींद, हमें तेरी याद आती है ||
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